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  • मगही लोकगीतों में रूप सौंदर्य क भावनात्मक वर्णन
  • https://doi.org/10.29121/shodhkosh.v5.i1.2024.3384Copy DOI Icon

मगही लोकगीतों में रूप सौंदर्य क भावनात्मक वर्णन

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Abstract

लोकमानव की ऐसी आदतें जो उसके अंदर जन्म से ही मौजूद है उसमें संस्कारगत समता के कारण सौंदर्य की भावनात्मक अनुभूति अह्लादन के रूप में होती है। इस संवेगनिष्ठ अनुभूति की अभिव्यक्ति के रूपों में भेद अवश्य हो सकती है। अभिजात्य वर्ग अपनी विकसित संस्कारित मानसिकता के कारण सौन्दर्यानुभूति की अभिव्यक्ति शिष्ट और सुसंस्कृत तरीके से कर सकता है। लोक जीवन में सौंदर्य की अनुभूति को व्यक्त करने का अलग तरीका हो सकता है परन्तु उसके सुन्दरता के संदर्भ में ज्ञानमूलक मनोवृत्ति में कोई खास अंतर नहीं हो सकता। लोकमानस के जीवन में रूप से संबंधित सौन्दर्य को केन्द्र में रखकर कन्या क विवाह संबंध स्थापित नहीं किया जाता बल्कि उसके स्वास्थ, शिक्षा और शीलगत सौन्दर्य पर विशेष रूप से बल दिया जाता है।’ उदाहरण के रूप में हम यह देख सकते हैं कि कैसे एक मगही लोकगीतकार काले दूल्हे में भी विशिष्टता, महानता, कर्मनिष्ठता और रूपात्मक सौन्दर्य को सम्मिलित कर देता है।

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